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महाशिवरात्रि की कथा


महाशिवरात्रि की कथा

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शिवरात्रि से जुडी कई कथाये है जिनमें से दो कथाओं का वर्णन यहाँ किया जा रहा है


समुद्र मंथन की कथा:


अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन से जहा अमृत प्राप्त हुआ वही हलाहल नामक विष भी निकला। हलाहल विष पूरे ब्रह्माण्ड को नष्ट कर सकता था, इस लिए इस विष को नष्ट करना बहुत जरूरी था और यह काम केवल भगवान शिव ही कर सकते थे। भगवान शंकर ने हलाहल विष को अपने गले में रख लिया। विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया जिससे उन्हे नीलकंठ कहा गया। इस विष के प्रभाव से ब्रह्माण्ड को बचाने के कारण भक्त इस दिन उपवास करते है।


 

शिकारी की कथा:


माता पार्वती ने भगवान शंकर से पूंछा - ऐसा कौन सा विधान है जिससे इस मृत्यु लोक में रहने वाले प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते है। शिवजी ने पार्वती जी को शिवरात्रि व्रत का विधान बताकर एक कथा सुनाई - चित्रभानू नाम का एक शिकारी था जो पशुओं की हत्या करके अपने कुटुम्ब का पालन-पोषण किया करता था। उस शिकारी ने एक साहूकार से ऋण लिया था जिसे वह समय पर नहीं चुका पाया था। जिस वजह से साहूकार क्रोधित हो गया और उसने शिकारी को एक शिव मंदिर में कैद कर दिया वह दिन शिवरात्रि का था।


शिकारी ने ध्यान लगाकर उस मंदिर में चल रही धार्मिक बाते सुनी और चतुर्दशी के दिन शिवरात्रि व्रत की कथा भी उसने सुनी। शाम होने पर साहूकार ने शिकारी को बुलाया और ऋण चुकाने के लिये कहा। शिकारी ने अगले दिन पूरा ऋण चुकाने का वचन दिया और वहा से चला गया। इसके बाद वह शिकार करने के लिये जंगल चला गया। साहूकार की कैद में रहने की वजह से वह भूख-प्यास से परेशान था। शिकार करने के लिये वह एक तालाब के किनारे पहुंचा और वहा एक बेल वृक्ष पर उसने पड़ाव बनाया। उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग था जो बेलपत्र से ढका था। पड़ाव बनाने के लिये उसने जब पेड़ की टहनियाँ तोड़ी तो कुछ बेलपत्र उस शिवलिंग पर गिरे। जिससे शिवलिंग पर बेलपत्री चढ़गई और दिन भर भूंका-प्यासा रहने के वजह से व्रत भी हो गया। रात्रि में एक हिरनी पानी पीने तालाब पर आती है, वह गर्भ से थी। शिकारी उसे देखकर निशाना लगाने लगता है। यह देखकर हिरनी कहती है मैं गर्भ से हूँ, मुझे मारकर तुम दो जीवो की हत्या करोगे जो ठीक नहीं है। अपने बच्चे को जन्म देकर में तुम्हारे पास वापस आ जाऊंगी तब तुम मुझे मार लेना। हिरनी की बात सुनकर शिकारी अपना धनुष नीचे कर लेता है और उसे जाने देता है।


इसके बाद दूसरी हिरनी तालाब का पानी पीने आती है। शिकारी उसे देखकर ख़ुश हो जाता है और उस पर निशाना लगाता है। शिकारी को देखकर हिरणी कहती है, हे शिकारी मैं कुछ देर पहले ही ऋतु से निवृत हुई हूँ कामातुर हूँ। मुझे जाने दो, अपने पति से मिलन कर मैं तुम्हारे पास वापस आ जाऊंगी। शिकारी उसे भी जाने देता है। जैसे-जैसे रात्रि बीत रही थी शिकारी की चिंता बढ़ रही थी क्यूंकि उसने साहूकार को ऋण चुकाने का वचन दिया था।


इसके बाद एक और हिरणी अपने बच्चे के साथ आती है। शिकारी तुरंत निशाना लगाता है। शिकारी के तीर छोड़ने से पहले ही हिरनी कहती है, हे शिकारी मैं इस बच्चे को इसके पिता के पास छोडकर वापस आ जाउंगी, मुझे मत मारो। हिरनी की बात सुनकर शिकारी हस्ता है और कहता है : मैं इतना भी मुर्ख नहीं हूँ कि सामने आये शिकार को जाने दू, मेरे बच्चे भूख से परेशान होंगे। शिकारी की बात सुनकर हिरनी कहती है : जिस तरह तुम्हे अपने बच्चों की चिंता है उसी तरह मुझे भी है। मेरे बच्चे की खातिर मुझे जाने दो। शिकारी उसे भी जाने देता है।


वृक्ष पर बैठकर शिकारी बेलपत्र तोड़कर निचे फेंखता जा रहा था। सूर्यौदय का समय होने वाला था तभी एक हट्टा-कट्टा हिरन वहा आता है। शिकारी ने तय कर लिया की इसका शिकार वह जरूर करेगा। शिकारी को देखकर हिरन बोला, हे शिकारी ! यदि मुझसे पहले आने वाली तीन हिरनियों और बच्चे का तुमने शिकार कर लिया है तो मुझे मारने में थोड़ा भी समय मत जाया करो क्यूंकि मैं उन हिरनियों का पति हूँ और उनसे वियोग का दुःख बिलकुल भी सहन नहीं कर सकता हूँ। और यदि तुमने उन्हें नहीं मारा तो मुझे भी कुछ समय दे दो ताकि मैं उनसे मिलकर तुम्हारे पास वापस आ सकू।


शिकारी पूरी घटना हिरन को बताता है। हिरन कहता है जिसप्रकार तुमने मेरी पत्नियों पर विश्वास किया उसी प्रकार मुझपर भी विश्वास करो और जाने दो अपने परिवार से मिलकर में उनके साथ तुम्हारे पास वापस आ जाऊंगा। उपवास, रात्रि जागरण, और शिवलिंग पर बेलपत्री चढाने से उसके दिल में दया भाव जाग गया था और उसकी हिंसक वृत्ति परिवर्तित हो चुकी थी। उसे अपने अतीत के कर्मो पर पछतावा हो रहा था।


कुछ देर बाद वह हिरन अपने पूरे परिवार के साथ शिकारी के सामने आता है ताकि वह शिकारी उनका शिकार कर सके। किन्तु उन जंगली जानवरो की सत्यनिष्ठा, आपसी प्रेम को देखकर शिकारी को आत्मग्लानि होती है। उसके आँखों से आंसू बहने लगे और शिकारी ने हिंसा त्याग दी। देवता भी इस घटना को देख रहे थे। इस घटना की परणिति होने पर देवताओ ने पुष्प वर्षा की। इस तरह शिकारी और हिरन का परिवार मोक्ष पाता है।


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