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योग का क्या अर्थ है | Yog Ka Kya Arth Hai

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महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है। अपनी इंद्रियों को वश में करके चेतन आत्मा से जुड़ने का विज्ञान योग है। योग ऐसा अनुशासन है जिसमें मनुष्य अपने शरीर, मन और इन्द्रियों को वश में करके अपने आत्म स्वरुप में स्थित होता है। अनेक जन्म लेने के कारण इस जन्म में भी चित्त में वासना की तरंगे उठती रहती हैं योग के माध्यम से अपनी इन चित्तवृत्तियों को पूरी तरह रोक देना ही पतंजलि ने योग बताया है।

महर्षि पतंजलि ने चित्तवृत्ति के निरोध के लिए अष्टांग योग का मार्ग बतलाया है। इस अष्टांग योग के 8 भाग हैं जिनमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यदि कोई इस अष्टांग योग का मार्ग अपनाता है तो वह अपने आत्मस्वरूप को प्राप्त कर सकता है।

अष्टांग योग (Ashtanga Yoga)

(1) यम– महर्षि पतंजलि के अनुसार यम का पालन करने से बाहरी सुधार होता है, जिससे व्यक्ति का बाहरी आचरण अच्छा होता है। आचरण अच्छा होने से व्यक्ति का मन शुद्ध होता है और मन के शुद्ध होने पर उस व्यक्ति के संस्कार अच्छे होते हैं, जिससे व्यक्ति अपनी मर्यादा में रहता है और दूसरों के द्वारा की गई प्रतिक्रिया से वह बच पाता है।

यम पांच होते हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह

(A) अहिंसा- अहिंसा एक बहुत ही व्यापक शब्द है। अहिंसा का मतलब केबल किसी को मारना नहीं होता बल्कि अपने मन, वचन और शरीर से किसी भी प्राणी को किसी भी तरह से थोड़ा भी दुख ना पहुंचाना अहिंसा होती है।

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(B) सत्य- अपनी इंद्रियों और मन से आप जो देखते हैं, सुनते हैं और जो अनुभव करते हैं उसे वैसा ही कहना सत्य कहलाता है। लेकिन ऐसा सत्य हितकर भी होना चाहिए। अगर सत्य कहने पर किसी का अहित होता है तो ऐसा सत्य ना बोलना ही अच्छा होता है क्योंकि इससे हम दूसरों को दुख पहुंचाते हैं। अपने व्यवहार को शुद्ध और छल कपट रहित रखना सत्य व्यवहार माना जाता है।

(C) अस्तेय- अस्तेय का अर्थ है चोरी ना करना। जब आप धोखे से, छल कपट करके, बेईमानी से, झूठ बोलकर दूसरे के अधिकारों का हनन करके धन-संपत्ति अर्जित करते हैं तो इसे चोरी माना जाता है। रिश्वत लेना, टैक्स की चोरी करना, झूठे बिल बनाकर सरकारी धन को हड़पना यह सभी चोरी मानी जाती हैं। इस प्रकार गलत तरीके से धन प्राप्त ना करना ही अस्तेय है।

(D) ब्रम्हचर्य- ब्रम्हचर्य का अर्थ होता है अपने मन, वाणी तथा शरीर से मैथुन का त्याग करना और अपने वीर्य की रक्षा करना। साधक को इन चीजों से बचना चाहिए। योग साधना में ऐसा माना जाता है कि वीर्य का बहुत महत्व होता है और इसे ही ऊर्जा का स्त्रोत माना जाता है।

(E) अपरिग्रह- अपरिग्रह के अनुसार योगी को अपना जीवन सात्विक तरीके से जीना चाहिए। उसे अपनी आवश्यकता से अधिक धन-संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए। अधिक धन संपत्ति अर्जित करने से मन में कई प्रकार की उलझन आ जाती है जिससे मन स्थिर नहीं रह पाता है और जब तक आपका मन स्थिर नहीं रह सकता योग साधना करना संभव नहीं है।

यदि आप इन आचरणों को अपने जीवन में अपनाते हैं या इनका पालन करते हैं तो ऐसा करने से आपका बाहरी आचरण शुद्ध होता है जिससे साधना में सहायता मिलती है।

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(2) नियम– नियमों का पालन करने से आंतरिक शुद्धि होती है। यह नियम होते हैं शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर शरणागति।

(A) शौच- अपने आपको स्वच्छ और पवित्र बनाए रखना। अपने घर ऑफिस में साफ-सफाई रखना, सही तरीके से धन अर्जित करना, अच्छा सात्विक भोजन करना, सभी के साथ अच्छा बर्ताव करना, साथ ही अपने विचारों को भी पवित्र रखना। यदि आपके मन में राग, द्वेष, धृणा, ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार जैसी बुराईयां रहती हैं तो आपके अंदर कभी भी पवित्रता नहीं आ सकती। इसलिए इन सभी चीजों को अपने से दूर कर देना ही शौच है।

(B) संतोष- संतोष का अर्थ होता है कि आप जिस परिस्थिति में है उसी में आप संतुष्ट रहें। सही तरीके से, ईमानदारी से जीवन यापन करते समय हमें जो धन-संपत्ति प्राप्त होती है उसी से अपना जीवन निर्वाह करें। अपनी इच्छाओं और वासनाओं को सीमित रखें और दूसरों से ईर्ष्या ना रखें। इसे संतोष कहा जाता है।

(C) तप- योग साधना करते समय हमें कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है उन परेशानियों और कष्टों को शांति से सहन करना तप कहलाता है। अपने आप को प्रताड़ित करना, जानबूझकर कष्ट पहुंचाना या शरीर को किसी प्रकार का कष्ट देना तप नहीं माना जाता। साधना करते समय जो परेशानी होती है उसे सहजता से सहन करना तप माना जाता है।

(D) स्वाध्याय- स्वाध्याय का अर्थ होता है कि आप स्वयं अध्ययन करें। इसमें आप ऐसे धार्मिक ग्रंथ पढ़ सकते हैं जिससे साधना करने में आपको सुविधा हो। आपके ज्ञान में वृद्धि हो और आपकी सोच सही हो। ऐसे धार्मिक ग्रंथ पढ़ने से आपमें साधना के प्रति उत्साह उत्पन्न होता है।

(E) ईश्वर शरणागति- ईश्वर शरणागति का अर्थ होता है कि आपके जीवन में जो भी हो रहा है उसे ईश्वर इच्छा माने। जो अच्छा हो रहा हो या जो कुछ बुरा हो रहा हो उन सभी चीजों को ईश्वर की मर्जी मानकर शांति से अपने जीवन में आगे बढ़ते जाएं।

(3) आसन– आसन का अर्थ होता है किसी एक स्थिति में सुख पूर्वक लंबे समय तक बैठना। हमारे चित्त में कई प्रकार के विचार उठते रहते हैं, जिससे हमारा मन अशांत रहता है। जब हम किसी एक आसन में स्थिर रहकर बैठते हैं तो हमारे मन में उठने वाले विचार भी शांत हो जाते हैं। जब हम योग साधना करते हैं तब हमें लंबे समय तक इसमें बैठना पड़ता है जिससे हम अपने योग को सिद्ध कर सके। यदि हमारे मन में विचार चलते रहते हैं तो इनका असर हमारे शरीर और इंद्रियों पर साफ देखा जा सकता है। मन में विचार चलने पर कई बार हम बैठे बैठे अपने हाथ-पैर को हिलाने लगते हैं, अपने हाथों से कुछ इशारे करते हैं, आंखों की पुतलियां हिलाते हैं, होठों को चलाते रहते हैं। यह सब मन में विचार चलने के कारण होता है। आप जिस भी आसन में लंबे समय तक सुख पूर्वक बैठ सकते हैं वही सबसे अच्छा आसन माना जाता है। सामान्य तौर से 3 आसनों को अच्छा माना गया है सिद्धासन, सुखासन और पद्मासन।

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(4) प्राणायाम– अष्टांग योग का चौथा अंग प्राणायाम है। ऐसा माना जाता है कि जब आपका आसन सिद्ध हो जाता है और स्वास गति रुक जाती है यह स्थिति प्राणायाम कहलाती है अर्थात ऐसी स्थिति जिसमें बैठकर श्वास की गति को नियंत्रित किया जा सके और पूरक, कुंभक तथा रेचक किया जा सके उसे प्राणायाम कहा जाता है।

(5) प्रत्याहार– प्रत्याहार का अर्थ होता है मन का सांसारिक विषयों की तरफ भागना बंद हो जाना। जब आप नियमित रूप से प्राणायाम करते हैं तो मन में उठने वाले विचार शांत होने लगते हैं और हमारा मन सांसारिक विषयों की तरफ भागना बंद कर देता है इस स्थिति को प्रत्याहार कहा जाता है। प्रत्याहार सिद्ध होने पर मनुष्य का या साधक का अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।

(6) धारणा– धारणा का अर्थ होता है अपने चित्त को किसी एक स्थान या वस्तु पर केंद्रित करना। जब आप अपना चित्त किसी एक चीज पर पूरी तरह केंद्रित करना सीखते हैं तो यह धारणा की स्थिति होती है।

(7 ) ध्यान– ध्यान का अर्थ होता है अपने चित्त को किसी चीज पर लंबे समय तक लगाए रखना। धारणा में हम अपने चित्त को एक वस्तु पर लगाना सीखते हैं और जब हम अपने चित्त को एक वस्तु पर लंबे समय तक लगाने में सफल हो जाते हैं तो वह स्थिति ध्यान कहलाती है। ध्यान में विचारों का प्रभाव बंद हो जाता है। ध्यान करने से अस्मिता में सुधार होता है और ध्यान स्थित होने पर साधक में अहंकार पूरी तरह से मिट जाता है।

(8) समाधि– ध्यान में हम किसी स्थान या वस्तु पर अपने चित्त को लगाते हैं। जब नियमित ध्यान करने से जिस स्थान या वस्तु का ध्यान करते हैं उसका स्वरूप मिट जाता है तो ऐसी स्थिति समाधि कहलाती है।

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सारांश

इस प्रकार महर्षि पतंजलि ने हमें अष्टांग योग का मार्ग बतलाया है। यदि हम इस अष्टांग योग के मार्ग को क्रमबद्ध तरीके से अपनाते हैं तो हम अपने आत्म स्वरूप को जान सकते हैं। यह मार्ग अपनाने में सरल और सहज है।

यदि हम इन नियमों को अपने सांसारिक जीवन में अपनाते हैं तब भी इनसे हमें बहुत लाभ होता है। यदि हम बेईमानी, धोखेबाजी, अहंकार, नफरत, राग, द्वेष जैसी बुराइयां छोड़ दें और ईमानदारी से धन-संपत्ति अर्जित करें तो हम कई सारी मुसीबतों और परेशानियों से बच सकते हैं।

योग साधना करने वालों के लिए अष्टांग योग का पालन करना बहुत जरूरी होता है। यदि वह किसी प्रकार की बुराई अपने अंदर रखकर योग साधना करता है तो उस साधक का योग कभी सिद्ध नहीं हो पाता है।

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