शिव पुराण की कथा (2) चंचुला देवी व उनके पति बिन्दुग को शिवलोक की प्राप्ति

शिव पुराण की कथा (2) चंचुला देवी व उनके पति बिन्दुग को शिवलोक की प्राप्ति

शिव पुराण की कथा (2) चंचुला देवी व उनके पति बिन्दुग को शिवलोक की प्राप्ति


बहुत समय पहले की बात है समुद्र के समीप वाष्कल नामक ग्राम हुआ करता था जहां पर बहुत से महापापी, दुष्ट और भोग-विलास में लगे हुए लोग रहा करते थे। वे सभी लोग देवताओं पर और भाग्य पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं किया करते थे। वे सभी व्यभिचारी और धर्म से विमुख थे। वहां की स्त्रियां भी स्वभाव से व्यभिचारिणी, पापी और स्वेच्छाचारी थी। इस प्रकार से वहां पर दुष्ट लोगों का ही निवास हुआ करता था।

वहां पर बिन्दुग नाम का एक ब्राह्मण भी रहा करता था जो अधर्मी, महा पापी था। उसकी स्त्री बहुत सुंदर थी तो भी वह गलत मार्ग पर चलता था और वैश्या का संग किया करता था। उसकी स्त्री का नाम चंचुला था। उसकी पत्नी चंचुला धर्म का पालन करने वाली थी। बिन्दुग हमेशा वैश्या के साथ ही समय व्यतीत करता था और अपनी पत्नी पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता था। इस तरह से कई साल बीत चुके थे। बिन्दुग की पत्नी चंचुला पति के द्वारा ध्यान न दिए जाने पर काम से पीड़ित हो चुकी थी तब भी वह अपने धर्म का पालन किया करती थी। बहुत वर्ष बीत जाने पर चंचुला अपने धर्म से भ्रष्ट हो गई और दुराचारी हो गई। उसने भी अधर्म का रास्ता अपना लिया और दुराचार करने लगी।

इस तरह से दोनों पति और पत्नी दुराचार में लगे रहे और कई साल व्यतीत हो गए। कुछ वर्षों बाद बिन्दुग का देहांत हो गया और उसे नर्क जाना पड़ गया। वह बहुत समय तक नर्क में दुख और कष्ट भोगता रहा इसके बाद विंध्याचल पर्वत पर वह पिशाच बन गया। बिन्दुग के मर जाने पर चंचुला अपने बच्चों के साथ ही घर पर रहने लगी।

एक समय चंचुला अपने रिश्तेदारों के साथ गोकर्ण नामक क्षेत्र में तीर्थ यात्रा के लिए गई। जहां पर उसने स्नान किया और फिर मेला घूमने के लिए चली गई। घूमते घूमते वह किसी शिव मंदिर के पास पहुंची जहां पर एक ब्राम्हण भगवान शिव का पवित्र मंगलकारी शिवपुराण की कथा सुना रहे थे। वह ब्राह्मण कह रहे थे कि "जो स्त्रियां दूसरे पुरुषों के साथ व्यभिचार करती हैं मरने के बाद जब वे यमलोक पहुंचती हैं तब यम के दूत उन स्त्रियों की योनियों में गर्म लोहे को डालते है।" इस बात को सुनकर चंचुला बहुत ज्यादा घबरा गई और डर से कापने लगी।

शिवपुराण की कथा समाप्त होने के बाद चंचुला उन ब्राह्मण के पास गई और ब्राह्मण से बोली कि मैं अपने धर्म को नहीं जानती थी इस कारण मुझसे अधर्म हो गया। मैंने बहुत दुराचार किया है और अब मुझे भय महसूस हो रहा है। मेरी मृत्यु के बाद जब यम के दूत मुझे बलपूर्वक लेकर जाएंगे तब मुझे वहां पर कई प्रकार का कष्ट भोगना होगा। इस बात को सोच कर मैं बहुत डर महसूस कर रही हूं क्योंकि मैं पाप में डूबी हुई हूं।

चंचुला ने आगे उस ब्राह्मण से कहा अब आप ही मेरे गुरु, मेरे माता और पिता है मैं आपकी शरण में आई हुई हूं आप मेरा उद्धार कीजिए और इतना कहकर उसने उन ब्राह्मण के चरणों को पकड़ लिया। ब्राह्मण ने चंचुला को उठाया और बोले कि यह तो तुम्हारा सौभाग्य है कि समय पर तुमने शिवपुराण की कथा को सुना और तुम्हें सद्बुद्धि प्राप्त हो गई। भगवान शिव की कृपा से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।

ब्राह्मण ने कहा मैं तुम्हें भगवान शिव की पावन शिवपुराण की कथा को सुनाऊंगा जिसको सुनकर मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और उसे वैराग्य, भक्ति की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। जो मनुष्य शुद्ध चित्त से भगवान शिव के चरणों का ध्यान करता है उसे एक जन्म में ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है। इतना कहने के बाद वे ब्राह्मण चुप हो गए और भगवान शिव के ध्यान में मग्न हो गए।

उन ब्राह्मण की बातों को सुनकर चंचुला बहुत प्रसन्न हुई और उसकी आंखों से प्रसन्नता के आंसू बहने लगे। चंचुला ने उन ब्राह्मण के सामने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और इसके बाद वह उन ब्राह्मण की सेवा में ही लगी रही।

ब्राह्मण की सेवा में रहते हुए चंचुला ने शिव महापुराण की पूरी कथा को सुना जिससे उसमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्य बढ़ने लगा और समय आने पर उसे मुक्ति प्राप्त हुई। उसकी मृत्यु होने पर एक दिव्य विमान आया जिस पर भगवान शिव के पार्षद मौजूद थे उन पार्षदों ने चंचुला को भगवान शिव के पास पहुंचा दिया। चंचुला के सारे पाप धुल चुके थे वह दिव्य रूप वाली हो गई थी, उसके मस्तक पर अर्धचंद्र का मुकुट था और वह दिव्य आभूषणों से विभूषित नजर आ रही थी।

शिवपुरी पहुंचने पर चंचुला ने भगवान शिव को देखा जिनके पांच मुख थे और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र थे। भगवान शिव के मस्तक पर अर्धचंद्राकार मुकुट शोभा पा रहा था। उन्होंने अपने शरीर पर भस्म धारण की हुई थी। गणेश जी, भृंगी, नंदीश्वर और वीरभद्रेश्वर आदि सभी उनकी सेवा में भक्ति भाव से उपस्थित थे। भगवान शिव के वाम भाग में माता गौरी विराजमान थी। भगवान शिव माता गौरी का दर्शन कर चंचुला बहुत प्रसन्न हुई और उसने भगवान शिव को माता गौरी को बार-बार प्रणाम किया उसकी आंखों से आनंद के आंसू बहने लगे थे। माता गौरी ने चंचुला को अपनी सखी बना लिया और चंचुला सुख पूर्वक वहां पर निवास करने लगी।

एक दिन चंचुला ने देवी गौरी के पास जाकर अपने दोनों हाथों को जोड़कर उनकी बहुत स्तुति की। चंचुला की स्तुति से देवी गौरी प्रसन्न हो गई और उन्होंने चंचुला से कहा मैं तुम पर प्रसन्न हूं बोलो क्या वर मांगना चाहती हो। चंचुला ने कहा मेरे पति की मृत्यु मुझसे पहले ही हो गई थी, मेरे पति हमेशा पाप कर्म में ही डूबे रहते थे वे इस समय कहां हैं और उनकी कैसी गति हुई है। ना जाने वह इस समय किस अवस्था में और कहां पर होंगे।

चंचुला की बातों को सुनकर माता गौरी ने कहा तुम्हारा पति बिन्दुग बहुत बड़ा पापी था। वह हमेशा पाप कर्म में ही लगा रहता था। मृत्यु के बाद उसे कई वर्षों तक नर्क में कई प्रकार के दुखों को भोगना पड़ा इसके बाद बचे हुए पापों को भोगने के लिए वह विंध्याचल पर्वत पर पिशाच बनकर कई प्रकार के क्लेश उठा रहा है।

माता गौरी की बातों को सुनकर चंचुला दुखी हो गई। फिर उसने माता गौरी से प्रार्थना की कि मुझ पर कृपा कीजिए और मेरे उस दुष्ट पति का उद्धार कर दीजिए ताकि मेरे उस पापी पति को उत्तम गति प्राप्त हो और मै पुनः अपने पति से संयुक्त हो सकू।

माता गौरी ने कहा यदि तुम्हारा पति शिव पुराण की पावन कथा को सुनता है तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे उत्तम गति प्राप्त होगी। तब चंचुला ने कहा ऐसा कोई उपाय कीजिए जिससे मेरे पति शिवपुराण की कथा को सुन सके और उन्हें उत्तम गति प्राप्त हो।

बिन्दुग को शिवपुराण की कथा सुनाने के लिए माता गौरी ने तुम्बुरु को बुलाया। तुम्बुरु को बुलाकर माता गौरी ने कहा मेरी सखी चंचुला का पति बहुत पापी था वह हमेशा पाप कर्म में लगा रहता था और अपवित्र रहता था, क्रोध के कारण उसकी बुद्धि मूढ़ हो चुकी थी, वह दूषित वस्तुओं का दान लेता और हिंसा किया करता था, चांडालो से प्रेम करता और प्रतिदिन वैश्या के संपर्क में रहता था। वह बहुत ही दुष्ट था उसने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया और दुष्टों के साथ समय व्यतीत करता था। अंत काल आने पर मृत्यु के बाद वह नरक में गया और अब विंध्याचल पर्वत पर पिशाच बनकर क्लेश उठा रहा है। तुम उसके आगे शिवपुराण की कथा का प्रवचन करो जो परम पुण्य मई और सभी प्रकार के पापों का नाश करने वाली है। शिवपुराण की कथा को सुनने से उसके सभी पाप कर्म नष्ट हो जाएंगे और वह प्रेत योनि को त्याग देगा जिससे उसे मुक्ति प्राप्त होगी। उसके मुक्त होने पर तुम उसे विमान पर बिठाकर भगवान शिव के पास ले आओ।

माता गौरी के इस प्रकार आदेश देने पर गंधर्व राज तुम्बुरु बहुत ही प्रसन्न हुए। वे चंचुला के साथ विमान पर बैठकर विंध्याचल पर्वत गए जहां पर वह पिशाच रहता था। उन्होंने विंध्याचल पर्वत पर उस पिशाच को देखा वह बहुत विकराल शरीर वाला था वह कभी हंसता तो कभी रोता और कभी उछल कूद करता था। तुम्बुरु जी ने उसे पाशो में बांध लिया और उसके आगे शिवपुराण की कथा का प्रवचन करने के लिए मंडप तैयार किया गया।

इस बात की चर्चा सभी जगह होने लगी कि एक पिशाच का उद्धार करने के लिए तुम्बुरु जी शिव पुराण की कथा का प्रवचन करने वाले हैं। जिससे दूर-दूर से बहुत से देवर्षि शिवपुराण की कथा को सुनने के लिए वहां पर पहुंचने लगे। तुम्बुरु जी ने उस पिशाच को पाशो में बांधकर एक आसन पर बिठाया और उसके सामने संपूर्ण शिव पुराण की कथा को कहा। शिवपुराण की कथा को आदरपूर्वक सुनने से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और उसने अपने पैशाचिक शरीर को त्याग दिया। उसका रूप दिव्य हो गया था वह चंद्रशेखर रूप हो गया था उसके तीन नेत्र थे। अब बिन्दुग अपनी पत्नी चंचुला के साथ भगवान शिव का गुणगान करने लगा था।

भगवान शिव का गुणगान करते हुए बिन्दुग, उसकी पत्नी चंचुला और तुम्बुरुजी विमान में बैठकर भगवान शिव के पास पहुंचे जहां भगवान शिव और माता गौरी ने प्रसन्नता पूर्वक बिन्दुग का सत्कार किया और उसे अपना पार्षद बना लिया। बिन्दुग की पत्नी चंचुला को माता गौरी ने अपनी सखी बना लिया और वे दोनों वहां पर परम सुखी होकर रहने लगे।

इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है


(1) इस कथा से हमें एक सीख यह मिलती है कि जो मनुष्य बुरे कर्म करता है, अधर्म करता है उसे अंत में अपने बुरे कर्मों का फल भोगना होता है।

(2) इस कथा से हमें एक सीख यह भी मिलती है कि जो मनुष्य समय रहते शिव महापुराण की कथा को सुनता या पढता है तो उसके सभी पाप नष्ट हो जाते है और उसे सद्गति प्राप्त होती है। मृत्यु के बाद वह शिवलोक में सुख पूर्वक निवास करता है।

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