🙏🙏शिव पुराण की कथा (5) नारद जी का काम विजय के गर्व से युक्त होना और अपने तप का बखान करना (भाग 1)

शिव पुराण की कथा (5) नारद जी का काम विजय के गर्व से युक्त होना और अपने तप का बखान करना (भाग 1)

🙏🙏शिव पुराण की कथा (5) नारद जी का काम विजय के गर्व से युक्त होना और अपने तप का बखान करना (भाग 1)


एक समय की बात है हिमालय पर्वत में एक गुफा थी वहां पर नारद जी ने तप करना आरंभ किया और बहुत दीर्घकाल तक वे तप करते रहे। नारद जी द्रणतापूर्वक तपस्या में स्थिर रहे। उन्होंने जो समाधि लगाई थी उसमें "मैं ब्राह्म हूं" यह विज्ञान प्रकट होता था। नारद जी की तपस्या को देखकर इंद्रदेव घबडा गए। उन्हें यह डर सताने लगा कि कहीं नारद जी उनका सिंहासन ना मांग ले। इस डर से इंद्रदेव ने कामदेव को बुलाया और उनसे नारद जी की तपस्या में विघ्न डालने के लिए कहा।



इंद्रदेव का आदेश पाकर कामदेव बसंत को अपने साथ लेकर नारद जी की तपस्या को भंग करने के लिए चल पड़े। जहां पर नारद जी तपस्या कर रहे थे वहां पहुंचकर कामदेव ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया और कई लीलाएं करी, लेकिन नारद जी पर कामदेव का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा जिससे कामदेव और बसंत दोनों का ही गर्व टूट गया।


नारद जी पर कामदेव का प्रभाव ना होने का कारण था कि जिस स्थान पर नारद जी तपस्या कर रहे थे उस स्थान पर पहले भगवान शिव ने तपस्या की थी और भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के लिए जब कामदेव आये तब भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था।


कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति और सभी देवताओं ने भगवान शंकर से प्रार्थना की कि कामदेव को पुनर्जीवित कर दें। तब भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना को सुनकर कामदेव को पुनर्जीवित करने की बात कह दी लेकिन भगवान शिव ने यह भी कहा कि जिस स्थान पर वे तपस्या कर रहे हैं उस स्थान पर कामदेव का प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी वजह से नारदजी पर भी कामदेव का प्रभाव नहीं पड़ा और कामदेव बसंत को लेकर वापस इंद्रदेव के पास लौट जाते हैं।


इंद्रदेव के पास लौटकर कामदेव और बसंत ने नारद जी की तपस्या का गुणगान किया जिसको सुनकर इंद्रदेव विस्मय में पड़ गए।


नारद जी इस तरह से दीर्घकाल तक तपस्या करते रहे। दीर्घ काल के बाद नारद जी को यह लगा कि उनकी तपस्या अब पूर्ण हो चुकी है ऐसा मानकर और मैंने काम पर विजय प्राप्त कर ली है इस बात पर नारद जी को अपने पर गर्व महसूस होने लगा।


गर्व की वजह से नारद जी अपना विवेक खो बैठे और काम पर विजय प्राप्त करने की बात भगवान शिव को बताने के लिए कैलाश पर्वत पर गए।


कैलाश पर्वत पर पहुंचकर नारद जी ने काम पर विजय पाने की बात भगवान शिव को बताई। नारद जी की बातों को सुनकर भगवान शिव बोले कि तुम बहुत विद्वान हो और धन्यवाद के पात्र हो लेकिन मेरी एक बात याद रखना अपने काम पर विजय वाली बात किसी को भी मत बताना विशेष रूप से भगवान विष्णु के सामने तो बिल्कुल भी मत कहना। ऐसी बातों को हमेशा गुप्त ही रखना चाहिए। तुम मुझे विशेष प्रिय हो इसलिए मैं तुम्हें यह आदेश दे रहा हूं।


नारद जी भगवान शिव की बात को नहीं मानते और ब्रह्मा जी के पास जाकर काम पर विजय की बात को बताते हैं ब्रह्मा जी भी उन्हें समझाते हैं कि यह बात तुम्हें किसी को भी नहीं बताना चाहिए परंतु नारद जी उनकी बात को भी नहीं मानते हैं।


इसके बाद नारद जी भगवान विष्णु के पास जाते हैं। भगवान विष्णु नारद जी को देखकर खड़े हो जाते हैं और उन्हें ह्रदय से लगा लेते हैं और उनसे आगमन का कारण पूछते हैं। भगवान विष्णु की बात को सुनकर नारदजी काम पर विजय का पूरा वृत्तांत सुना देते हैं। नारद जी की इन गर्वपूर्ण बातों को सुनकर भगवान विष्णु काम विजय का वास्तविक कारण जान जाते हैं। भगवान विष्णु नारद जी से कहते हैं तुम धन्य हो और तपस्या के भंडार हो तुम्हारे जैसा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य किसी में नहीं है तुम ब्रह्मचारी हो और हमेशा ज्ञान, वैराग्य में ही लगे रहते हो तुम्हारे अंदर काम विकार कैसे आ सकता है।


भगवान विष्णु की इन बातों को सुनकर नारदजी जोर-जोर से हंसने लगते हैं और भगवान विष्णु को प्रणाम करके वहां से चले जाते हैं।


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